Category Archives: Prateeksha Pandey

इन बेदिमाग़ कबूतरों का क्या है

by Prateeksha Pandey

 

-पटेल चेस्ट-

फोटोकॉपी की दुकानें सभी

लगती हैं फोटोकॉपी एक-दूसरे की

जब तक गिर न जाएँ थक कर सब शटर,

जब तक मशीनों की काली स्याही

दुकानदारों के अंगूठों से छूटकर

फ़ैल न जाए उफ़क तक.

यहाँ दिन सभी

निकलते जाते हैं मानों किसी मशीन के मुंह से

खच-खच-खच-खच

काले-सफ़ेद

एक से

कुछ बिखरे बिखरे

और कुछ एक साथ करीने से स्टेपल किये हुए.

***

 

-हडसन लेन-

~

हर शाम

बातों के छल्ले

मुंह से निकल कर

खो जाते हैं

परांठों और चाउमीन का आर्डर दोहरा रहे लड़के की आवाज़ में.

 

हर शाम

छात्र नेताओं और भिखारियों को

अनदेखा करने लिए

मजबूरन

ठहाके लगा लेते हैं लोग

और फिर लौटा ले जाते हैं निगाह

संजीदगी से

प्लेट और चम्मच की जुगलबंदी में.

 

एक सुबह

मकानमालकिन ने

खिड़कियाँ पोंछ रही लड़की का चिढ़ा हुआ मुंह देख कर कहा—

इन बेदिमाग़ कबूतरों का क्या है

जहां दाना लेकर बैठ जाएँ

वहीँ घर कर लेते हैं.

***

 

Very Short Stories

I

by Rahul Sen
~
Loy won’t let his model preview his portrait until it’s finished. The model would come each day and bare herself on the sofa to strike a pose. The same pose was being struck days after days.

The gentle locks falling on her forehead, the soft bend of her neck, the rotundity of her well shaped breasts, were being intently gazed at by him. Part by part, within and without, observed with an impeccable vision and an instinctive intellect. But his hands seldom moved; it was only his pupils that rolled all over her body and seemed to swim within the reservoirs of her exceeding beauty.

Yet, one day, when out of sheer curiosity she went to the other side of the canvas in his absence, she found the canvas devoid of her figure, devoid of any human outline… It contained iridescent shades of hues – red, yellow, green, violent, orange – strokes that crisscrossed the white canvas to carve out a space of wonder that captures love and art in abstraction….

***

II
by Tina Das
~
We never hugged- we are scared of it. It never happened that success was celebrated with physical contact of any sort. We liked to be “dignified”. Funny, we were anyway a strange family- uh no, not strange, quaint sounds better.

It was the second year of my hostel- dad had decided to visit. He sat in the visitors room, stoic, or “dignified”. He saw two giggly girls hug and kiss each other and asked me, “Is it a new trend? This hugging business?”

I smiled and waved it away with a shrug.

The day I walked back with a battered face, courtesy a protest against rape. My mom screamed at me. She said it was not required- this drama of protest. I kept quiet- of course, she didn’t know I was also raped once, by the old man who claimed to be my uncle. Dad didn’t know, of course. He didn’t know till the day when his granddaughter was pawed by the same man and she ran to me for a big hug. We all hugged then, quaint family, we hugged too late.

***

III
by Prateeksha Pandey
~
ऑफिस में बैठे बैठे लाल टी-शर्ट वाले लड़के ने एक उदास कविता लिखी. फिर लोगों की वाहवाही पर एक खिन्न मुस्कान के साथ लैपटॉप का फ्लैप गिरा दिया. ठहाकों में बाकी दिन गुज़र गया. घर आकर बैग खोला तो वाहवाह करने वालों की फेहरिस्त में 15 नाम और जुड़ गए थे पर ठहाके गायब थे. ये ठहाके रोज़ कहाँ छूट जाते हैं? पर खिन्न मुस्कान तो अपनी ही है. फिर वो खाना खा कर दाहिनी करवट सो गया. सुबह उठा तो पिछली रात के खाने का स्वाद मुंह में पुरानी स्मृतियों की तरह बसा हुआ पाया. हर सुबह खिड़कियों से नयी उदासी चली आती है. आज फिर कुछ झूठे जुमलों और सच्ची कविताओं के औजारों से दिन को ठोक-पीट के बराबर करना होगा.

***

image source: unknown

सब दुरुस्त है

by Prateeksha Pandey

~

बूढ़े दरख्तों के नीचे उग आये मशरूमों को देखकर

या आधी रात में रोते कुत्तों की आवाज़ से

चौंक उठती है

खिल उठती है स्याह फूलों सी.

उदासी तो

मन के पिछले कमरों में

माँ की तरह हलकी नींद सोती है.

~

-मोची-
(हिमांशी के लिए)

टूटे हुए रबड़ के पट्टे को
घिसे हुए तलवे में पेंचकस से घुसेड़कर
टाँके लगाएगा
और ऐसे सोलूसन से चिपकायेगा
कि चप्पल फिर नयी सी दिखेगी,
चल ही जायेगी हाँफते-घिसते
कुछ और महीनों तक.

मेरे और तुम्हारे बीच भी सब दुरुस्त है.
~

image courtesy: Stuti Bhattacharya

अंकल जी

by Prateeksha Pandey

~

तब उनकी उम्र नहीं बढ़ती थी
बस बढ़ता था पेट
सफारी सूट की कमीज़ की बटनों की क़ैद से छूटने को.
वो पैंट की पिछ्ली जेब में रक्खी
भूरे रंग की कंघी को
और सर्दी के मौसम में अपनी बदसूरत
कैन्थ्राइडीन तेल से महकती फर वाली टोपी
हमारे यहाँ
भूल जाया करते थे.
वैसे तो अंकलजी को फुर्सत कहाँ थी
पर रविवार को
धारियों वाले नीले कच्छे में
बड़े गर्व से घर के बाहर दातुन करते थे.
अंकलजी को एक ही दुःख था—
गुप्ता जी का लौंडा साला
अमेरका—
नहीं, यूं.एस. चला गया
पर माता रानी की कृपा देखो
उनके अपने डिम्पी की शादी में
मारुती ज़ेन मिली
और सारे दुःख
दन्न से गायब हो गए.

पर ये कुछ साल पहले की बात है.

अब तो अंकलजी
अपनी आसमानी रंग की प्रिया से
शेक्सपियर की सिक्स्थ एज में आ पहुंचे हैं
खिजाब से झुर्रियां पहले भी नहीं छुपती थीं
पर अब तो अंकल कोशिश भी नहीं करते.

अब तो अंकलजी
बस गर्मागर्म बूंदी खाते हैं
और हर चुनाव में
कमल को वोट दे आते हैं.

~

अस्पताल

by Prateeksha Pandey

~

सफ़ेद दीवारों और हरे पर्दों के बीच
बिस्तरों
कुर्सियों
व्हीलचेयरों
पर पड़े
अलग अलग वज़न के
मांस के लोथड़े—
कुछ कराहते
कुछ बेचैन
कुछ उम्मीद की बोतल चढ़वाते हुए
अपने कष्ट को दूसरों से कमतर आँकते.

फिर भी खिलखिला के हँस सकती हैं
सफ़ेद कोटों में घूम रहीं
जादूगरनियाँ
मानो कह रही हों
“इतने से दर्द से ही डर गए?”

इसी इमारत के अन्दर
पैदा होते और दम तोड़ते हैं
अमीरी और गरीबी
अगल बगल के कमरों में
और कभी
कभी फेंक जाता है बाप
अपनी चौथी बेटी को मरीज़ बनाकर
उसे कभी वापस न ले जाने के लिए

~

image source: The Times (June 20, 2012)

और खिल उठते हैं मोहब्बत के फूल…

by Prateeksha Pandey

I

प्रेम है
कैफ़े में बैठे हुए
चाय और ठहाकों के बीच
यूँ ही बाहर झाँकना
और तब्दील होते देखना
काँच की दीवारों को
एक बूढ़े क़िले में
जिसके एकाकी, बदरंग दरीचों के किनारे
फूट रही हों कोपलें
नर्म, नाज़ुक याद कीं
और दीवारों से
बदन जोड़कर चढ़ रही हो एक बेल
दर्द की.
प्रेम
चाय की दो चुस्कियों के बीच
एक बूढ़े क़िले के
सबसे अंधकारमयी कमरे में जाकर
तुम्हें चूम के आने तक का
सफ़र है.

~

II

चालीस खोपड़ियों में घूम रहे
चालीस हज़ार सवाल
किताब पर लिखे अक्षरों से घूमकर
लौट आते हैं मैडम के कानों में पड़े
मछलीनुमा झुमके पर.
घंटी लगते ही
वर्दियों में ऊंघते सिपाही
बदल लेतें हैं अपनी उबासियाँ
उसकी मुस्कानों से
और पसीने की गंध में खिल उठते हैं
मोहब्बत के फूल.

~

image source: Der Kuss (The Kiss), 1909, by Gustav Klimt

बुर्कों में औरतें

by Prateeksha Pandey

~

(गुरुवार की बाज़ार में
काले लिबास में घूम रही सैकड़ों औरतों के बीच
फ़र्क जान पाना नामुमकिन है
अगर तुम न हो
चूड़ीवाला,
दर्ज़ी,
क्लिप, कंघी, बालों के फ़ीते, नेलपॉलिश
या फिर सुई, धागे, बटन, चमकीले गोटे बेचने वाला)

क्या तुम मुझे
परदे से छन के आ रही आवाज़ में बताओगी
की जून की जलती दुपहरियों में
कभी सादी, उदास
तो कभी महँगी कारीगरी वाली
रातें ओढ़कर
कैसा लगता है?

burkon mein auratein

~

image sources

featured: by Soumya Raj
end image: The Indian Express (Archives)